Thursday, 28 December 2017

श्रम क़ानूनों में मज़दूर-विरोधी संशोधन

एनडीए सरकार द्वारा श्रम क़ानूनों में मज़दूर-विरोधी संशोधन 

पीपल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (नवम्बर 2017)
(हिन्दी अनुवाद – प्रबल अगरवाल)

एनडीए सरकार द्वारा ‘मेक इन इण्डिया’, ‘स्किल इण्डिया’, ‘डिजिटल इण्डिया’ और ‘व्यापार की सहूलियत’ जैसे कार्यक्रमों का डंका बजाते हुए श्रम क़ानूनों में संशोधन किये जा रहे हैं। श्रम मन्त्रालय द्वारा 43 श्रम क़ानूनों को 4 बड़े क़ानूनों में समेकित किया जा रहा है। इसी कड़ी में 10 अगस्त 2017 को लोक सभा में ‘कोड ऑफ़ वेजिस बिल, 2017’ पेश किया गया। प्रत्यक्ष रूप से इस बिल का उद्देश्य वेतन सम्बन्धी निम्न चार केन्द्रीय श्रम क़ानूनों के प्रासंगिक प्रावधानों का एकीकरण व सरलीकरण करना है

(1) पेमेण्ट ऑफ़ वेजिस एक्ट, 1936, (2) मिनिमम वेजिस एक्ट, 1948, (3) पेमेण्ट ऑफ़ बोनस एक्ट, 1965, (4) इक्वल रेम्यूनरेशन एक्ट, 1976। ग़ौरतलब है कि प्रस्तावित संशोधन मज़दूर विरोधी हैं और मालिकों/प्रबन्धन के मुक़ाबले उनकी स्थिति को मज़बूती देने की जगह और कमज़ोर कर देते हैं। इसका विश्लेषण निम्नलिखित है।

रोज़गार सूची – इस कोड में एम्प्लॉयमेण्ट शेड्यूल को हटा दिया गया है जो श्रमिकों को कुशल, अर्ध-कुशल और अकुशल की श्रेणी में बाँटती थी। ये नियम उन मज़दूरों के लिए तो उपयोगी है जो लोग एम्प्लॉयमेण्ट शेड्यूल में नहीं है जैसे घरेलू मज़दूर (13 राज्यों को छोड़कर घरेलू मज़दूर शेड्यूल में नहीं आते, इसलिए न्यूनतम मज़दूरी दरें उन पर लागू नहीं होतीं)। परन्तु इसका दुष्प्रभाव कुशल और अर्ध-कुशल मज़दूरों पर होगा जो मालिक से अधिक वेतन प्राप्त करने योग्य हैं।

मज़दूरी तय करने के मापदण्ड – प्रस्तुत कोड में न्यूनतम मज़दूरी की दर समयानुसार (टाईम वर्क) और मात्रानुसार (पीस वर्क) तय होगी और वेतनकाल घण्टे, दिन या महीने के हिसाब से हो सकता है। मज़दूरी तय करने के लिए सरकार काम के लिए आवश्यक कौशल, कठिनाई, कार्यस्थल की दूरी और अन्य उपयुक्त पहलू ध्यान में रख सकती है। यह नियम खुलेआम सुप्रीम कोर्ट के न्यूनतम मज़दूरी सम्बन्धी फ़ैसलों की धज्जियाँ उड़ाता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह कई बार दोहराया है कि न्यूनतम मज़दूरी मज़दूर की सभी आवश्यकताओं के हिसाब से तय होनी चाहिए। न केवल उसकी साधारण शारीरिक ज़रूरतों के आधार पर और न ही उत्पादन के आधार पर। इसके अनुसार न्यूनतम मज़दूरी तय करते समय आहार-पोषण, पहनने-रहने, इलाज का ख़र्च, पारिवारिक ख़र्च, शिक्षा, ईंधन, बिजली, त्योहारों और समारोहों के ख़र्च, बुढ़ापे और अन्य ख़र्चों का ध्यान रखा जाना चाहिए। 1992 के मज़दूर प्रतिनिधि सचिव बनाम रेप्ताकोस ब्रैट प्रबन्धन केस में सुप्रीम कोर्ट ने न्यूनतम मज़दूरी के लिए निम्न 6 मापदण्ड तय किये थे – (1) एक मज़दूर को 3 व्यक्तियों के उपभोग का पैसा मिले, (2) एक औसत भारतीय वयस्क के लिए न्यूनतम आहार आवश्यकता 2700 कैलोरी, (3) हर परिवार के लिए सालाना 72 यार्ड्स कपड़ा, (4) सरकारी औद्योगिक आवास योजना के अन्तर्गत प्रदान किये गये न्यूनतम क्षेत्र का किराया, (5) न्यूनतम मज़दूरी का 20% ईंधन, बिजली और अन्य ख़र्चों के लिए, (6) कुल न्यूनतम मज़दूरी में 25% बच्चों, स्वास्थ्य, शिक्षा, मनोरंजन (त्योहार, समारोह आदि), बुढ़ापे, शादी आदि के लिए। बिल में इन सब मापदण्डों को ख़त्म करने का प्रयास है। हालाँकि कोड के अनुच्छेद 7 (2) के अनुसार राज्यों को जीवनयापन में होने वाले ख़र्चे के हिसाब से समय-समय पर वेतन निश्चित करने का प्रावधान है लेकिन यह बहुत ही अस्पष्ट है और यहाँ तक कि अनिवार्य भी नहीं है।

काम करने के घण्टे और ओवरटाइम – प्रस्तुत कोड के अनुच्छेद 13 के अनुसार सरकार यह तय कर सकती है कि एक आम दिन में कुल कितने घण्टे काम होगा। लेकिन सरकार निम्न कर्मचारियों के लिए इस नियम को ताक पर भी रख सकती है –
  1. वे कर्मचारी जिन्हें किसी आपातकालीन काम में लगाया गया है जिसका पहले से अन्देशा न हो
  2. वे कर्मचारी जिनसे कोई ऐसा काम लिया जा रहा है जो मुख्य काम का पूरक है और आम कामकाज के दौरान नहीं हो सकता
  3. वे कर्मचारी जिनका रोज़गार अनिरन्तर है
  4. वे कर्मचारी जो ऐसे काम में लगे हैं जो तकनीकी कारणों से ड्यूटी ख़त्म होने से पहले ही करने हैं
  5. वे कर्मचारी जो ऐसा काम कर रहे हैं जो प्रकृति की अनियमितता पर निर्भर हैं
ये नियम पूरी तरह ओवरटाइम की वर्तमान व्यवस्था के खि़लाफ़ हैं जिसके अनुसार दिन में 9 घण्टे से ज़्यादा और हफ़्ते में 48 घण्टे से ज़्यादा काम करना ‘ओवरटाइम’ कहलाता है। ओवरटाइम की इस परिभाषा को ख़त्म करके एवं पूरक कार्य और अनिरन्तर काम के बहाने ये अनुच्छेद ओवरटाइम के लिए मिलने वाली अतिरिक्त मज़दूरी पर एक योजनाबद्ध हमला है।

मालिकों को बोनस से छुटकारा – 1965 के पेमेण्ट ऑफ़ बोनस एक्ट ने नयी कम्पनियों को बोनस न देने की छूट दी थी, लेकिन वर्तमान कोड नयी कम्पनी किसे कहा जा सकता है, इसे अस्पष्ट बनाकर पूरी तरह कम्पनियों को बोनस देने के नियम से छुटकारा दिलवाने के चक्कर में है। नयी कम्पनी की परिभाषा में अब किसी “फ़ैक्टरी का ट्रायल रन” और “किसी ख़ान की पूर्वेक्षण की अवस्था” भी जोड़ दी गयी है, जिन पर कोई समय का बन्धन भी नहीं है। पुरानी कम्पनियाँ भी ट्रायल रन व पूर्वेक्षण की अवस्था के नाम पर मज़दूरों को बोनस देने से बच सकती हैं।

इस कोड ने कम्पनियों की आज्ञा के बिना उनकी बैलेंस शीट तक उजागर करने पर सरकारी अधिकारियों पर यह तर्क देते हुए प्रतिबन्ध लगा दिया है कि कम्पनियों पर विश्वास करना चाहिए और उन्हें अपने हिसाब-किताब की प्रमाणिकता का कोई सबूत भी देने की ज़रूरत नहीं है। यूनियनों या मज़दूरों को अब मुनाफ़ों से सम्बन्धित किसी स्पष्टीकरण के लिए ट्रिब्यूनल या आरबीट्रेटर के पास जाना होगा, जो कि उपयुक्त लगने पर ही स्पष्टीकरण देने के लिए बाध्य होंगे।

वेतन में मनमानी कटौती – अनुच्छेद 18 मालिकों को यह अधिकार देता है कि वह किसी भी मज़दूर के असन्तोषजनक काम के चलते या अपने “नुक़सान की पूर्ति” करने के लिए उसकी तनख़्वाह काट सकते हैं! क्योंकि तनख़्वाह काटने के लिए किसी भी प्रकार की औपचारिक प्रक्रिया की ज़रुरत ही नहीं रह जायेगी, मालिक इसका इस्तेमाल मनमाने ढंग से मज़दूरों को सज़ा देने के लिए करेंगे।

लिंग आधारित भेदभाव – प्रस्तुत कोड ने 1976 के इक्वल रेम्यूनरेशन एक्ट (बराबर वेतन अधिनियम) के उन प्रावधानों को ख़त्म कर दिया है जो महिलाओं के लिए रोज़गार पैदा करने के पक्ष में थे और लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव के खि़लाफ़ थे।

लेबर इंस्पेक्टर की जगह ‘फ़ैसिलिटेटर’ – प्रस्तुत कोड कमिश्नर और इंस्पेक्टर की जगह ‘फ़ैसिलिटेटर’ की बात करता है जो “कोड को लागू करने के लिए मालिकों और मज़दूरों को सुझाव देगा”। यह फ़ैसिलिटेटर राज्य सरकारों के नियमानुसार फ़ैक्टरियों का निरीक्षण करने के लिए भी जि़म्मेदार होते हैं। लेकिन प्रस्तुत कोड ऑनलाइन निरीक्षण पर ज़ोर देता है, जिससे अचानक किये जाने वाले शारीरिक निरीक्षण की प्रथा ख़त्म हो जायेगी। और तो और प्रस्तुत कोड इण्टरनेट द्वारा ‘सेल्फ़-सर्टिफि़केशन’ (आत्म-प्रमाणीकरण) का भी प्रावधान ले आया है।

ट्रेड-यूनियनों पर रोकटोक – यह बिल यूनियन की गतिि‍वधियों में मज़दूरों को शामिल होने पर सीधा प्रतिबन्ध लगाने का प्रयास है। इसके तहत मज़दूरों की यूनियन की गतिविधियों में भागीदारी केवल चन्दे तक ही सीमित रह पायेगी।

मालिकों के खि़लाफ़ कार्यवाही पर रोकटोक – 1948 के ‘मिनिमम वेजिस एक्ट’ (न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम) के अनुसार न्यूनतम मज़दूरी न देने से मालिक को जेल हो सकती है। 1983 के संजीत रॉय बनाम राजस्थान सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह फ़ैसला सुनाया था कि न्यूनतम मज़दूरी न देना बेगारी/ज़बरदस्ती काम लेने के बराबर है, जो पूरी तरह असंवैधानिक है। इसके विपरीत प्रस्तुत कोड वेतन और बोनस के सवाल को आपराधिक मामले के दायरे से सिविल मामले के दायरे में ले आया है। जो मालिक कोड का उल्लंघन करेगा, उसे कोड को मानने का एक और मौक़ा दिया जायेगा और सज़ा देने से पहले कोड न मानने के पीछे का कारण पूछा जायेगा। अपराधी द्वारा समझौते से निपटारा कर लेने पर उसके अपराधों को पूरी तरह माफ़ कर दिया जायेगा।

वेतन में संशोधन के लिए तय समयसीमा का ख़ात्मा – 1948 के मिनिमम वेजिस एक्ट के अनुसार ज़रुरत पड़ने पर न्यूनतम मज़दूरी में संशोधन होना चाहिए और यह संशोधन अधिकतम पाँच साल के भीतर हो जाना चाहिए। यह ट्रेड यूनियनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण प्रावधान है, क्योंकि इसी के दम पर वे प्रबन्धन से वार्ता करती हैं। लेकिन प्रस्तुत कोड में इस नियम पर भी हमला किया गया है। अनुच्छेद 8 के अनुसार – “उपयुक्त सरकार हर 5 साल बाद न्यूनतम मज़दूरी दर की समीक्षा या संशोधन करेगी”। समीक्षा का विकल्प लाकर 5 साल के अन्तराल में वेतन संशोधन की अनिवार्यता वाले प्रावधान को एक तरह से ख़त्म ही कर दिया गया है।
प्रस्तुत कोड के ज़रिये लाये जा रहे संशोधन सीधे-सीधे मालिकों के पक्ष को और मज़बूती देते हैं और मज़दूरों के हक़ों की लम्बी लड़ाई को खारिज़ करते हैं।


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Wednesday, 27 December 2017

असंगठित क्षेत्र में कामगारों की पहचान

पत्र सूचना कार्यालय
भारत सरकार
श्रम एवं रोजगार मंत्रालय
27-दिसंबर-2017 16:31 IST


असंगठित क्षेत्र में कामगारों की पहचान

असंगठित कामगार सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008 में असंगठित कामगार की परिभाषा दी गयी है तथा ऐसे कामगार को इस बात की पुष्टि करने की कि वह एक असंगठित कामगार है, स्वघोषणा करने की व्यवस्था की गयी है।
भारत में असंगठित कामगारों का कोई केन्द्रीयकृत राष्ट्रीय डाटाबेस नहीं है। असंगठित कामगारों के लिए एक राष्ट्रीय मंच बनाने का विनिश्चय किया गया है। केन्द्रीय सरकार ने 402.7 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से कामगारों को बिना कोई स्मार्ट कार्ड जारी किये एक अद्वितीय आई-डी अर्थात असंगठित कामगार पहचान संख्या (यूडब्ल्यूआईएन) तथा आधार वरियता प्राप्त पहचान संख्या आवंटित करने का एक प्रस्ताव पास किया है जो अगले दो वर्ष 2017-2018 तथा 2018-2019 के दौरान कार्यान्वित किया जाएगा।
यह सूचना श्रम तथा रोजगार राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री संतोष कुमार गंगवार ने आज राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में दी।

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वीके/जेडी/एमएम – 6110            

भारतीय आर्थिक संघ के शताब्दी सम्मेलन के उद्घाटन के अवसर पर माननीय राष्ट्रपति श्री राम नाथ कोविंद का वक्तव्य

पत्र सूचना कार्यालय
भारत सरकार
राष्ट्रपति सचिवालय
27-दिसंबर-2017 16:40 IST


भारतीय आर्थिक संघ के शताब्दी सम्मेलन के उद्घाटन के अवसर पर माननीय राष्ट्रपति श्री राम नाथ कोविंद का वक्तव्य
राष्ट्रपति श्री राम नाथ कोविंद ने कहा कि भारतीय आर्थिक संघ के 100वें वार्षिक सम्मेलन में सम्मिलित होकर मुझे हर्ष हो रहा है। भारतीय अर्थशास्त्रियों की इस संस्था की स्थापना 1917 में हुई थी, और आज यह देश की सबसे बड़ी अकादमिक संस्था के रूप में विकसित हुई है। इसकी सदस्य संख्या लगभग सात हजार है, जिसमें कई प्रतिष्ठित व्यक्ति और संस्थान शामिल हैं।
राष्ट्रपति महोदय ने भारतीय आर्थिक संघ को बधाई देते हुए कहा कि इस संस्थान ने महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। नीतियों के अध्ययन से देश को बहुत लाभ हुआ है। संघ के कई सदस्यों ने तमाम नीति-निर्माता निकायों में सेवाएं दी हैं, जिनमें वित्त आयोग, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद और योजना आयोग शामिल हैं। वर्ष 1917 से संघ की पत्रिका ‘इंडियन इकोनॉमिक जर्नल’ लगातार प्रकाशित हो रही है। इस पत्रिका में अनुंसधान और समकालीन प्रासंगिक विषयों का प्रकाशन होता है।
वार्षिक सम्मेलन एक महत्वपूर्ण आयोजन है जिसमें संघ के सभी सदस्य सम्मिलित होते हैं। शताब्दी समारोह को ध्यान में रखते हुए इस वर्ष की विषय वस्तु ‘भारतीय आर्थिक विकासः स्वतंत्रता उपरांत अनुभव’ है। राष्ट्रपति महोदय ने कहा कि सम्मेलन के दौरान राजकोषीय नीति से लेकर विदेशी कारोबार सहित कृषि और सामाजिक-आर्थिक असमानता पर चर्चा की जाएगी। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि अमेरिका, स्विट्जरलैंड और मलेशिया सहित विभिन्न देशों के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं। उन्होंने कहा कि नोबेल पुरस्कार से सम्मानित बांग्लादेश के प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस आज सम्मेलन के विशिष्ट अतिथि हैं। राष्ट्रपति महोदय ने कहा कि अर्थशास्त्र के क्षेत्र में प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस के योगदान से पूरा उप-महादीप गौरवान्वित हुआ है। उन्होंने कहा कि मैं प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस और अन्य अंतर्राष्ट्रीय प्रतिनिधियों का हृदय से स्वागत करता हूं।
राष्ट्रपति महोदय ने कहा कि पिछले 100 वर्षों के दौरान अर्थशास्त्र एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय के रूप में विकसित हुआ है। यह ऐसा विषय है जिसमें इतिहास, भूगोल, दर्शन और चरित्र का समावेश है। उन्होंने कहा कि अर्थशास्त्र एक ऐसी विशाल नदी की तरह है जिसमें विभिन्न तरंगे मौजूद है। ये तरंगे समाजशास्त्र की भी है और सांख्यिकी की भी।
श्री राम नाथ कोविंद ने कहा कि आज तमाम देशवासी अब भी निर्धनता में जीवनयापन कर रहे है या अभाव में हैं। स्वास्थ्य सुविधा, शिक्षा, आवास और नागरिक सुविधाओं से वे वंचित हैं। उन्होंने कहा कि समाज के पारम्परिक रूप से कमजोर वर्ग जैसे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और महिलाएं इनमें शामिल हैं। वर्ष 2022 तक नव भारत के स्वप्न को पूरा करने के लिए इस समस्या को हल करना बहुत आवश्यक है। उल्लेखनीय है 2022 में हमारी स्वतंत्रता को 75 वर्ष हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में निवेश करने की आवश्यकता है।
श्री कोविंद ने कहा कि मैंने जिन मुद्दों का उल्लेख यहां पर किया है, वे वास्तव में भारत के संविधान की राज्य सूची में शामिल है। इसलिए यह आवश्यक है कि इन मुद्दों को स्थानीय और राज्य स्तर पर हल किया जाना चाहिए, ताकि ‘भारतीय विकास अनुभव’ को आगे बढ़ाया जा सके। उन्होंने कहा कि ‘सहकारी संघवाद’ के युग में और 14वें वित्त आयोग की रिपोर्ट के कार्यान्वयन के बाद विभिन्न राज्यों का दायित्व बढ़ गया है।
राष्ट्रपति महोदय ने कहा कि केन्द्र सरकार के साथ मैं भी अर्थशास्त्री समुदाय से आग्रह करता हूं कि वे हमारी राज्य सरकारों के साथ मिलकर अधिक से अधिक काम करें और उन्हें सलाह देकर विकास में योगदान करें। उन्होंने कहा कि इस संदर्भ में मैं आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री एन. चन्द्रबाबू नायडू को बधाई देता हूं कि उन्होंने अपने राज्य को आर्थिक विचारशीलता के क्षेत्र में अग्रणी बनाया है।
राष्ट्रपति महोदय ने उपस्थितजनों को संबोधित करते हुए कहा कि दुनिया द्वितीय विश्वयुद्ध के समाप्त होने के बाद गत कई दशकों तक कुछ वास्ताविकताओं के साथ जीती रही, जो अब समाप्त हो रही हैं। इन बदलावों से अर्थशास्त्र अछूता नहीं है। हमारे सामने ऐसी परिस्थिति है जहां कई समाज उदार कारोबारी व्यवस्था के लिए संरक्षणवाद को अपना रहे हैं। भारत जैसी उदीयमान अर्थव्यवस्था को विश्व संपर्क के लिए आवाज उठानी होगी, जहां व्यापार लोगों के लिए लाभप्रद हो।
श्री कोविंद ने कहा कि घरेलू मुद्दे भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। औपचारिक रोजगार का युग धीरे-धीरे रोजगार अवसर पैदा कर रहा है और स्व-रोजगार अवसर भी सामने आ रहे हैं। यह अवसर खासतौर से सेवा क्षेत्र और डिजिटल अर्थव्यवस्था में हैं। उन्होंने कहा कि हमें अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को समझना होगा और उसके अनुरूप नीतियां बनानी होंगी। हमें सामाजिक सुरक्षा उपाय भी तैयार करने होंगे ताकि कामगारों की सुरक्षा हो सके।
उन्होंने कहा कि मुझे खुशी है कि भारत सरकार ने इन विषयों को चिन्हित किया है। स्टार्ट अप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया, मुद्रा योजना और जन धन योजना जैसे कदमों से लाखों लोग बैंकिंग व्यवस्था से जुड़ गए हैं।
श्री कोविंद ने कहा कि हमारे अर्थशास्त्रियों को इन चुनौतियों और विषयों पर विचार और उनका विश्लेषण करना होगा ताकि भावी रोड मैप तैयार हो सके। उन्होंने कहा कि मुझे भरोसा है कि अगले चंद दिनों के दौरान इन सभी विषयों पर सम्मेलन में चर्चा होगी। मुझे पूरा विश्वास है कि संघ के सभी सदस्य हमारे राष्ट्र की विकास प्रक्रिया से जुडेंगे और देशवासियों के कल्याण के लिए प्रयत्नशील होंगे। उन्होंने सम्मेलन की सफलता की कामना की और सभी को नववर्ष की बधाई दी।

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Thursday, 21 December 2017

भारतमाला परियोजना: एनएचएआई ने राष्ट्रीय राजमार्ग निवेश संवर्धन प्रकोष्ठ (एनएचआईपीसी) बनाया

पत्र सूचना कार्यालय
भारत सरकार
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय
21-दिसंबर-2017 18:11 IST

एनएचएआई ने राष्ट्रीय राजमार्ग निवेश संवर्धन प्रकोष्ठ (एनएचआईपीसी) बनाया
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने राजमार्ग परियोजनाओं के लिए घरेलू एवं विदेशी निवेश आकर्षित करने हेतु एक राष्ट्रीय राजमार्ग निवेश संवर्धन प्रकोष्ठ (एनएचआईपीसी) बनाया है। यह प्रकोष्ठ सड़क अवसंरचना परियोजनाओं में निवेशकों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए वैश्विक संस्थागत निवेशकों, निर्माण कंपनियों, डेवलपरों और कोष प्रबंधकों के साथ सहभागिता पर अपना ध्यान केन्द्रित करेगा। सरकार ने ‘भारतमाला परियोजना’ के तहत 5,35,000 करोड़ रुपये के निवेश से अगले पांच वर्षों में 35,000 किलोमीटर लम्बे राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। इसके लिए आवश्यक भारी-भरकम निवेश को ध्यान में रखते हुए सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रों से घरेलू एवं विदेशी निवेश दोनों की ही विशेष अहमियत है। 

एनएचआईपीसी मुख्य रूप से सड़क से जुड़े बुनियादी ढांचे या अवसंरचना में विदेशी एवं घरेलू निवेश को बढ़ावा देने पर अपना ध्यान केन्द्रित करेगा। एनएचआईपीसी इसके लिए भारत सरकार के विभिन्न संबद्ध मंत्रालयों एवं विभागों, राज्य सरकारों, शीर्ष वाणिज्यिक चैम्बरों जैसे कि फिक्की, एसोचैम और इन्वेस्टइंडिया, इत्यादि के साथ मिलकर काम करेगा। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए एनएचआईपीसी भारत स्थित विदेशी दूतावासों एवं मिशनों और विदेश में अवस्थित भारतीय दूतावासों एवं मिशनों के साथ भी मिलकर काम करेगा।
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ग्रामीण आबादी के वित्तीय समावेशन के लिए दर्पण परियोजना लांच की गई

पत्र सूचना कार्यालय
भारत सरकार
संचार मंत्रालय
21-दिसंबर-2017 18:13 IST

ग्रामीण आबादी के वित्तीय समावेशन के लिए दर्पण परियोजना लांच की गई
संचार मंत्री श्री मनोज सिन्हा ने आज सेवा गुणवत्ता में सुधार, सेवाओं में मूल्यवर्धन तथा बैंक सेवा से वंचित ग्रामीण आबादी के वित्तीय समावेशन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए दर्पण – “डिजिटल एडवासंवेंट ऑफ रूरल पोस्टऑफिस फॉर ए न्यू इंडिया” परियोजना लांच की। उन्होंने कहा कि 1400 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ आईटी आधुनिकीकरण परियोजना का लक्ष्य प्रत्येक शाखा पोस्ट मास्टर (बीपीएम) को कम शक्ति का टेक्नालाजी समाधान उपलब्ध कराना है। इससे सभी राज्यों के ग्रामीण उपभोक्ताओं की सेवा में सुधार के लिए लगभग 1.29 लाख शाखा डाकघर सेवा देंगे। श्री सिन्हा ने बताया कि आज की तिथि में 43,171 शाखा डाकघरों ने दर्पण परियोजना को अपना लिया है ताकि ग्रामीण आबादी के वित्तीय समावेशन का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके। यह लक्ष्य मार्च, 2018 तक पूरा करना है।
इस परियोजना से ग्रामीण आबादी तक डाक विभाग की पहुंच बढ़ेगी और सभी वित्तीय प्रेसण, बचत खाता, ग्रामीण डाक जीवन बीमा और नकद प्रमाण पत्र में वृद्धि होगी। परियोजना से स्वचालित बुकिंग की अनुमति तथा खाता योग्य सामग्री की डिलिवरी से मेल संचालनों में सुधार होगा, खुदरा डाक व्यवसाय से राजस्व बढ़ेगा, तीसरे पक्ष के एप्लीकेशन उपलब्ध होंगे और मनरेगा जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के लिए वितरण सहज होगा।
आईटी आधुनिकीकरण परियोजना के हिस्से के रूप में डाक विभाग ने विभिन्न कामकाजी क्षेत्रों में बिजनेस प्रोसेस रिइंजीनियरिंग का काम किया है और इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए टू-बी प्रोसेस तैयार किया है। उपलब्धि के रूप में डाक विभाग द्वारा पूरे देश में 991 एटीएम स्थापित किए गए हैं जो अन्य बैंकों के साथ अंतर संचालित हैं। डाक विभाग के व्यापक नेटवर्क विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में नेटवर्क होने से सामान्य जन को प्रत्यक्ष लाभ मिला है। डाक विभाग के एटीएम मशीनों पर अब तक 1,12,85,217 लेन-देन किए गए। इसमें से 70,24,214 लेन-देन गैर-डाक विभाग के उपभोक्ताओं द्वारा किए गए। डाक विभाग इस क्षेत्र में एकमात्र सरकारी संस्था है।
पिछले 150 से अधिक वर्षों से डाक विभाग देश की संचार व्यवस्था का रीढ़ रहा है। डाक विभाग ने देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में महत्वपूर्म भूमिका निभाई है। डाक विभाग अनेक प्रकार से भारतीय नागरिकों के जीवन को छूता है। विभाग द्वारा मेल डिलिवरी की जाती है, लघु बचत योजनाओं के अंतर्गत जमा स्वीकार किए जाते हैं, डाक जीवन बीमा (पीएलआई) तथा ग्रामीण डाक जीवन बीमा (आरपीएलआई) के अंतर्गत जीवन बीमा कवच प्रदान किया जाता है तथा बिल एकत्र करने तथा विभिन्न फार्मों की बिक्री जैसी खुदरा सेवाएं दी जाती हैं। डाक विभाग महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) वेज वितरण तथा वृद्धावस्था पेंशन भुगतान जैसी सेवाएं नागरिकों को प्रदान करता है। 1.5 लाख डाक घरों के साथ डाक विभाग विश्व का सबसे अधिक विस्तृत डाक नेटवर्क है।
शहरीकरण, वित्तीय सेवाओं की बढ़ती मांग, सरकार द्वारा समाज के कमजोर वर्गों तथा ग्रामीण क्षेत्र के लिए अधिक धन दिए जाने जैसी प्रवृत्तियों से डाक विभाग के लिए नए अवसरों के द्वार खुले हैं। इसलिए नए प्रोसेस तथा समर्थनकारी टेकनॉलाजी की आवश्यकता है। डाक विभाग के समक्ष स्पर्धा बढ़ाने और संचार प्रौद्योगिकी विशेषकर मोबाइल टेलीफोनी तथा इंटरनेट में अग्रिम कदम बढ़ाने की दोहरी चुनौती है। श्रेष्ठ उपभोक्ता सेवा प्रदान करने, नई सेवाएं देने तथा संचालन संबंधी सक्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से डाक विभाग ने प्रारंभ से अंत तक आईटी आधुनिकीकरण योजना प्रारंभ किया है ताकि विभाग स्वयं को आवश्यक आधुनिक उपायों तथा टेकनालाजी से लैस कर सके। आईटी आधुनिकीकरण परियोजना के निम्नलिखित लक्ष्य हैं –

  1. उपभोक्ता से सक्रियता बढ़ाकर व्यापक रूप से भारतीय आबादी तक पहुंचना
  2. बेहतर उपभोक्ता सेवा
  3. नए व्यवसायों के माध्यम से विकास
  4. आईटी सक्षम बिजनेस प्रोसेस तथा समर्थनकारी कार्य

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वीके/एएम/एजी/सीएस-6057     


‘सुशासन एवं सर्वोत्तम प्रथाओं की प्रतिकृति’ पर दो दिवसीय क्षेत्रीय सम्मेलन कल गुवाहाटी में शुरू होगा

पत्र सूचना कार्यालय
भारत सरकार
कार्मिक मंत्रालय, लोक शिकायत और पेंशन
21-दिसंबर-2017 18:52 IST

 ‘सुशासन एवं सर्वोत्तम प्रथाओं की प्रतिकृति’ पर दो दिवसीय क्षेत्रीय सम्मेलन कल गुवाहाटी में शुरू होगा 
‘सुशासन एवं सर्वोत्तम प्रथाओं की प्रतिकृति’ पर क्षेत्रीय सम्मेलन का शुभारम्भ कल गुवाहाटी में होगा। इस दो दिवसीय सम्मेलन का आयोजन भारत सरकार के कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय के प्रशासकीय सुधार एवं लोक शिकायत विभाग (डीएआरपीजी) द्वारा असम सरकार के सहयोग से किया जा रहा है। असम के मुख्यमंत्री श्री सर्बानंद सोनोवाल कल इस सम्मेलन का शुभारम्भ करेंगे और प्रतिनिधियों को संबोधित करेंगे।
इस सम्मेलन का उद्देश्य एक ऐसा साझा प्लेटफॉर्म बनाना है, जहां नागरिक केन्द्रित गवर्नेंस, सार्वजनिक सेवाओं की बेहतर डिलीवरी, सुशासन सूचकांक, प्रधानमंत्री द्वारा की गई पहलों और डीएआरपीजी की राज्य सहयोग पहल योजना के बारे में जागरूकता से संबंधित अनुभवों को साझा किया जा सकेगा।
सम्मेलन के दौरान छह सत्र आयोजित किए जाएंगे। विभिन्न सत्रों के विषय ये हैं: ‘सार्वजनिक सेवाओं की उत्तरदायी डिलीवरी’, ‘प्रशासकीय सुधारों में राज्यों की सहयोगात्मक पहल’, ‘प्रधानमंत्री द्वारा की गई पहल 2017’, ‘अरुणाचल प्रदेश, असम, नगालैंड एवं मेघालय द्वारा की गई गवर्नेंस संबंधी पहलों पर पूर्वोत्तर राज्यों की ओर से प्रस्तुतियां’ और ‘राज्यों की रैंकिंग के लिए सुशासन सूचकांक विकसित करना।’ इसके बाद ‘कनेक्टिविटी: ई-गवर्नेंस के लिए पहली आवश्यकता’ पैनल परिचर्चा आयोजित की जाएगी।
असम सरकार के मुख्य सचिव श्री विनोद कुमार पिपरसेनिया और भारत सरकार के डीएआरपीजी के सचिव श्री के.वी. इयापेन 23 दिसम्बर, 2017 को समापन समारोह को संबोधित करेंगे।
36 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधि इस सम्मेलन में भाग लेंगे।
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आतंकवाद और पृथकतावाद भारत और माली के लिये अभी भी चुनौती बने हुये हैं: उपराष्‍ट्रपति (Africa)

पत्र सूचना कार्यालय
भारत सरकार
उप राष्ट्रपति सचिवालय
21-दिसंबर-2017 16:00 IST

आतंकवाद और पृथकतावाद भारत और माली के लिये अभी भी चुनौती बने हुये हैं: उपराष्‍ट्रपति

उच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायाधिशों के अध्‍यक्ष श्री अब्‍द्रहमाने नियांग के नेतृत्‍व के एक प्रतिनिधिमंड़ल के
उपराष्‍ट्रपति और राज्‍य सभा के सभापति श्री एम. वेंकैया नायडू ने कहा है कि आतंकवाद और पृथकतावाद अभी भी भारत और माली तथा संपूर्ण विश्‍व के लिए चुनौती बने हुए हैं। वे उच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायाधियों के अध्‍यक्ष श्री अब्‍द्रहमाने नियांग के नेतृत्‍व में एक प्रतिनिधिमंडल तथा माली के दो सांसदों के साथ आज यहां चर्चा कर रहे थे। इस अवसर पर राज्‍यसभा के उपसभापति डॉ. पी.जे. कुरियन, राज्‍यसभा के महासचिव श्री देश दीपक वर्मा और अन्‍य गणमान्‍य भी उपस्थित थे।
उपराष्‍ट्रपति ने कहा कि भारत माली में नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र की परियोजनाओं के लिए ऋण देने के लिए तैयार है। उन्‍होंने कहा कि भारत ने पहले से ही माली के लिए सीमा शुल्‍क मुक्‍त टैरिफ प्राथमिकता योजना शुरू की है और भारतीय आयातक इसका लाभ उठा रहे हैं। उन्‍होंने कहा कि भारत माली के साथ अपने विकास संबंधी सहयोग साझेदारी को और सुदृढ़ करने के लिए प्रतिबद्ध है।
उपराष्‍ट्रपति ने कहा कि अमूल्‍य इस्‍लामिक ग्रंथों और पांडुलिपियों के साथ टिम्‍बकटू का विरासत स्‍थल संपूर्ण विश्‍व के लिए असाधारण सांस्‍कृतिक संपदा है। उन्‍होंने कहा कि भारत ‘ताजमहल मिट्स टिम्‍बकटू’ नामक प्रदर्शनी के जल्‍द से जल्‍द शुरू होने को लेकर उत्‍सुक हैं।
उपराष्‍ट्रपति ने जी-5 साहेल संयुक्‍त बल के गठन पर माली सरकार को बधाई दी। यह बल माली और इस क्षेत्र की एकता, शांति, विकास और समृद्धि में सहयोग करेगा।

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वीके/एएम/एमके/वाईबी–6050

Estimates of Gross Domestic Product (GDP), Net Domestic Product (NDP) and National Income, measured as Net National Income (NNI)

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